Wednesday, December 15, 2010

ये तो ऐसे ही हैं ? - चन्दन यादव

ये तो ऐसे ही हैं ? - चन्दन यादव
                              
                             सरकारी स्कूलों में जब किसी बच्चे से अपेक्षित काम उससे नहीं हो रहा होता है तब अक्सर सुनाई देने वाली कुछ टिप्पणियां इस तरह की होती हैं, ये नहीे सुधरेंगे। ये तो हैं ही ऐसे। ये तो जन्मजात बुद्धिहीन हैं। इनके मां बाप ही ऐसे हैं। ये तो हैं ही संस्कारहीन। षिक्षकों द्वारा बच्चों पर आरोपित की गई इन टिप्पणियों का मकसद यह प्रतिपादित करना होता है कि बच्चों के नहीं सीखने के लिये उनका परिवार, परिवेष, जाति या धर्म जिम्मेदार है।
स्कूल में बच्चों को सिखाना षिक्षक का काम है। अगर बच्चे नहीं सीख पा रहे हैं तो सबसे पहले उन्हें अपने काम करने के तरीके की समीक्षा करनी चाहिये। वे सोच सकते हैं कि कमजोर बच्चों को सिखाने के लिये उन्होंने क्या कोषिषें की हैं। क्योंकि यह उन्हीं से अपेक्षित है कि बच्चे सीख पायें, पर बच्चे के परिवार, समाज या धर्म को इसके लिये जिम्मेदार ठहराकर जाहिर तौर पर वे खुद की जिम्मेदारी के बारे में विचार करने से साफ बच जाते हैं। इन टिप्पणियों में यही उजागर होता है कि हमने तो अपना काम अच्छी तरह किया है अगर बच्चे ही ऐसे हैं तो हम क्या कर सकते हैं ? मगर यह पूरा सच नहीे है, क्योंकि जब वे ये टिप्पणियां कर रहे होते हैं तब उनसे कोई यह पूछ नहीं रहा होता है कि बच्चों के नहीं सीख पाने का क्या कारण है ? दरअसल षिक्षकों के ऐसा कहने के जो कारण हैं वे इससे कहीं अधिक गंभीर और चिंतनीय हैं जो इसकी गहरी पड़ताल की मांग करते हंै।
कक्षा के अन्दर की कुछ घटनाओं के उदाहरण से हम इस बात को समझने का प्रयास कर सकते हैं। एक बार एक षिक्षक ने बच्चों के कमजोर रह जाने का एक नायाब कारण मुझे बताया, उन्होंने कहा कि  क्या है कि ये बच्चे हैं मुसलमान। घर से बासा मटन, मछली खाकर आते हैं। फिर होता यह है कि किसी का पेट दुख रहा है, किसी को टट्टी लग रही है। अब बताओ ऐसे में पढ़ने में कैसे मन लगेगा ?
जाहिर है वे बच्चों के खानपान को उनके सीखने, ना सीखने से जोड़कर देख रहे थे। इस कहने में यह भी निहित था कि तथाकथित सात्विक खानपान सीखने में ज्यादा मददगार होता है।
एक और षिक्षिका अक्सर कहती रहती हैं कि इन बच्चों के मां बाप दारू पीकर पड़े रहते हैं, इसलिये ये बच्चे कभी नहीं सीख सकते। किसी बच्चे के मां बाप अपने घर में दारू पीते हैं, इस बात का स्कूल के अन्दर सीखने सिखाने पर क्या असर पड़ सकता है। घर में दारू पीने और स्कूल के अन्दर बच्चे के सीखने में कोई रिष्ता नहीं है, क्योंकि ऐसा होने से किसी षिक्षक के पढ़ाने के तरीके प्रभावित नहीं होते। “
इतना जरूर है कि स्कूल में जो बच्चे पढ़ने आ रहे हैं, उनके परिवार के लोग पढ़े लिखे नहीं हैं इसलिये वे घर में बच्चे के सीखने में कोई मदद नहीं कर पाते। पर यह बात स्कूल आ रहे लगभग सभी बच्चों के मां पिता पर लागू होती है।
ऊपर जिन टिप्पणियों का जिक्र किया गया है, वे प्राइवेट स्कूलों में षायद ही सुनाई दें। इन स्कूलों में भी बच्चों के मनोबल को तोड़ा जाता है पर उसके तरीके दूसरे होते हैं जो इस लेख का विषय नहीं है।
                      दरअसल बच्चों के ना सीखने पर उनके परिवार, परिवेष, जाति अथवा धर्म को जिम्मेदार ठहराने की कोषिषों के पीछे खुद की नाकामी को छुपाना उतना बड़ा कारण नहीं है, जितने बड़े दूसरे अन्य कारण हैं, जो समाज के अन्य लोगों खासकर वंचित तबके के लोगों को लेकर षिक्षकों की खास समझ को दर्षाते हैं। हमारे समाज में कई तबकों को लेकर कुछ पूर्वाग्रह मौजूद हैं। गोंड समुदाय के बारे में एक कहावत है गोंड के घर में दाना, गोंड गया गर्राना। जिसका मतलब यह है कि गोंड के घर में खाने को दाने हों तो वह काम पर नहीं जाता। यानि गोंड सिर्फ खाने की चिंता करते हैं। यह भी माना जाता है कि बुद्धि जन्मजात होती है तथा यह ऊंची जाति के लोगों में ज्यादा होती है। इसी तरह स्त्रियों के बारे में भी कई नकारात्मक पूर्वाग्रह मौजूद हैं। लोग इन की सच्चाई पर बिना कोई सवाल किये इनको ही सच मानते आ रहे हैं। मन में जड़ जमाये बैठे इस तरह के पूर्वाग्रह ही किसी खास तबके को आरोपित करते समय जाहिर हो रहे होते हैं।
षिक्षक की ऐसी टिप्पणियां बच्चों को उनकी विपरीत परिस्थितियों से उबारने के बजाय उनमें हीनता बोध पैदा कर रहे होते हैं। निष्चित ही बच्चों के स्कूल छोड़ देने और ना सीख पाने में इन टिप्पणियों का योगदान भी कम नहीं होता होगा ?
                                       बींदकंदेंउअंक/ ह उंपसण्बवउ

No comments:

Post a Comment