Tuesday, December 14, 2010

चकमक क्‍लब की अवधारणा

चकमक क्लब की अवधारणा
भूमिका- हमारे समाज का ताना बाना इस तरह का है जिसमें बच्चों को एक खास तरह की वंचितता में अपना बचपन बिताना होता है। यह वंचितता है बच्चों के लिये अपना कौषल बढ़ाने के लिये काम करने, अपनी समझ और अनुभवों को दूसरों के साथ साझा करने, पहल करने और निर्णय लेने के मौकों का अभाव।
बच्चों के बारे में आम धारणा है कि वे खुद से सोचने, समझने, निर्णय लेने और किसी बात पर अपने विचार व्यक्त करने में सक्षम नहीं होते। परिवार और स्कूल दोनों ही इस बात को बहुत पक्की तौर पर मानते हुए दिखाई देते हैं। इसलिये बड़े बच्चों को हर काम में सहायता देने के लिये आतुर रहते हैं। इस धारणा के चलते बच्चों की क्षमताओं का सहज विकास बाधित होता है।
समाज के बड़े, बच्चों की हर गतिविधि को अपने चष्मे से देखते हैं। वे उनके काम पर अपनी राय देने और उसके बारे में निर्णायक होने के लिये लालायित रहते हैं। इसलिये बच्चे भी इस तरह अनुकूलित हो जाते हैं कि वे खुद भी अपने कामों को जिन आधारों पर अच्छा या बुरा, सही या गलत मानते हैं, वे बड़ों के बनाये होते हैं। यह स्थिति बच्चों के व्यक्तित्व को इस तरह से प्रभावित करती है कि वेे आगे भी दूसरों पर निर्भर बने रहते हैं।
इसलिये हमें लगता है कि समाज में बच्चों के ऐसे मंच होना चाहिये जहाँ उन्हें स्वतंत्रता और सहजता के साथ विभिन्न गतिविधियाँ जैसे पढ़ना, विज्ञान के प्रयोग करना, चित्र बनाना, क्राफ्ट के काम करना, लिखना, अपने आसपास को समझने के लिये छोटे छोटे अध्ययन करना जैसे मौके मिल सकें। और इनमें से बच्चे अपनी रुचि के अनुसार काम चुन सकें। 
इसके साथ ही बच्चों के इन मंचों को बड़ों के प्रभाव और दखल से भी भरसक मुक्त होना चाहिये। इनको बच्चों के लिये, बच्चों के द्वारा, बच्चों का मंच होना चाहिये। जहाँ पर बच्चे मिलजुलकर काम करें, निर्णय लें और पहल करें। इस तरह के काम के लिये उदाहरण स्वरूप ऊपर बताई गतिविधियों में बच्चों को स्रोत व्यक्ति के तौर पर तैयार करने के लिये बड़ों के सहयोग की आवष्यकता है।
इस तरह का एक प्रयोग एकलव्य द्वारा 1982 से 2004 तक देवास, होषंगाबाद और हरदा जिले के छोटे कस्बों में किया गया था। इनको चकमक क्लब कहा जाता था। इनमें से देवास जिले के सतवास से निकले बच्चों ने इस काम को समाज के लिये उपयोगी पाया। और 1 जून 2009 से सतवास में बच्चों का एक मंच बनाकर काम करना प्रारम्भ किया है। इसको अपनी जगह नाम दिया गया है।
बच्चों पर चकमक क्लब का प्रभाव- चकमक क्लब में रहे और उससे निकले बच्चों (जो अब बड़े हो गये हैं।) को देखने पर हम पाते हैं कि मिलजुलकर निर्णय लेने और काम करने की इस प्रक्रिया से निकले लोग कई उन बुराइयों से मुक्त हैं, जो हमारे समाज की मुख्य समस्या है। वे जाति, धर्म आदि की जकड़न से दूर हैं। उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक और प्रगतिषील है। वे लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार करते हैं। महिलाओं को समानता का दर्जा देते हैं। और अपने मूल्यों और विष्वासों को अपने से अधिकार और ताकत में बड़े लोगों के सामने आत्मविष्वास के साथ रख पाते हैं। चकमक क्लब में रहते हुए ही कई बच्चों ने अपनी रुचि को पहचाना और उसमें अपनी क्षमताओं को आगे बढ़ाया। हम चकमक क्लब से निकले लगभग ऐसे 100- 150 लोगों को जानते हैं जिन्होंने जीवन यापन के लिये सरोकारपूर्ण काम चुना है।
समाज पर प्रभाव- इस काम का स्थानीय समाज पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिये सतवास के वे षिक्षक ओर पालक जो चकमक क्लब से जुड़े बच्चों को जानते हैं। वे मानते हैं कि चकमक क्लब में जाने वाले बच्चे आत्मविष्वास से भरे और पहल लेने वाले होते थे। स्थानीय लोग चकमक क्लब के बच्चों पर भरोसा करते थे। और चकमक क्लब के काम से बाहर जाने के लिये भी सहजता से अपनी लड़कियों लड़कों को इजाजत देते थे।
इमरान और सुनील के अनुभव- चकमक क्लब को समझने के लिये दो अनुभवों को पढ़ना मददगार हो सकेगा। इमरान ने एक बच्चे के तौर पर खुद के चकमक क्लब से जुड़ने और वहाँ से सीखने की प्रक्रिया का वर्णन किया है।
सुनील ने वहाँ के अनुभव पर एक लेख लिखा है। जो ‘षैक्षिक विमर्ष’ (दिगन्तर, जयपुर का प्रकाषन)में प्रकाषित हुआ है।

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