सतवास में चकमक क्लब 12 सालों तक चलता रहा इसमें संसाधनो में मदद एकलव्य द्वारा की जाती थी। बाद में इसे समावेश द्वारा संचालित किया जाने लगा। यहां स्रोत बच्चे चकमक क्लब की व्यवस्था को संचालित करते थे। हम कह सकतें है कि यह जगह बच्चों की अपनी जगह होती थी,कब बालमेले होगें ,कौन सी गतिविधियां होगीं, कैसे हम अपने काम को करेंगें और कौन समनवयक होगा यह सब एक लोकतांत्रिक तरीके से बच्चे ही तय करते थे। यह चित्र 1995 के बाल मेले का है। शा.प्रा.शाला.सतवास
Tuesday, December 7, 2010
हम चाहते है समाज में बदलाव
हम अक्सर सोचतें हैं कि समाज में बदलाव कैसे लाऐं पर हमने कभी समाजिकरण की प्रक्रिया को अदलने की बात मन में नहीं आने दी क्योकि इस प्रक्रिया ने हमारे मन में इसके प्रति इतना विश्वास भर दिया है की हम उससे बाहर आने की कोशिष भी नहीं कर पातें हैं। अगर हम सच में कुछ करना है तों पहले अपने अन्दर भरे उस दूषित विचार को त्यागना होगा जो बरसों से हमारे मन को बदले नहीं देता है हमें सामज में एक नई व्यवस्था को बनाना होगा जहां हम सब का सम्मान कर सकें सभी को बरारी से बोलने के मौका दे सकें हम अपने से छोटो को भी सुन सकें एसा मन को बनाना होगा । क्योकि जब तक बडें बोलेगें तों समाज फिर वो ही पुरानी बातों को अतीत में देखता रहेगा जो बहुत पहले गुजर चुकि है। हमें दूसरो को सुनने के साहस जुटाना होगा ।
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