सतवास में चकमक क्लब 12 सालों तक चलता रहा इसमें संसाधनो में मदद एकलव्य द्वारा की जाती थी। बाद में इसे समावेश द्वारा संचालित किया जाने लगा। यहां स्रोत बच्चे चकमक क्लब की व्यवस्था को संचालित करते थे। हम कह सकतें है कि यह जगह बच्चों की अपनी जगह होती थी,कब बालमेले होगें ,कौन सी गतिविधियां होगीं, कैसे हम अपने काम को करेंगें और कौन समनवयक होगा यह सब एक लोकतांत्रिक तरीके से बच्चे ही तय करते थे। यह चित्र 1995 के बाल मेले का है। शा.प्रा.शाला.सतवास
Monday, December 13, 2010
हम कहतें हैं। हम इस जाहां की तसवीर बदल देगें पर हमारे घर की ही तसवीर हम नहीं बदल पातें हैं। आज भी हमारे घरों हमें अपने से बढों के आगें हर वक्त झुका रहना पढता है । महज इस लिऐं की उन्होने हमें बडा किया है। हमें समय से खाना दिया है पर यह सब किस लिए अपने लिए एक गुलाम तैयार करने के लिए आज भी हम युवा किसी दूसरे धर्म में शादी कर ले तो हमें हमारे ही रहनुमा मार देतें है या उनका चाहिता मार देता है । हम पैसे कामाने वाली माशीनो में महिलाओं को कम मौका मिलता है वो इस लिए की उनके लिए हमारे इस समाज में एक ऐसी व्यवस्था को बना दिया है या यूं कहे थोप दिया है जिसमें उन्हें केवल मर्दो की रहगुजारी करना है
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