Monday, December 13, 2010

हम कहतें हैं। हम इस जाहां की तसवीर बदल देगें पर हमारे घर की ही तसवीर हम नहीं बदल पातें हैं। आज भी हमारे घरों हमें अपने से बढों के आगें हर वक्‍त झुका रहना पढता है । महज इस लि‍ऐं की उन्‍होने हमें बडा कि‍या है। हमें समय से खाना दि‍या है पर यह सब कि‍स लि‍ए अपने लि‍ए एक गुलाम तैयार करने के लि‍ए आज भी हम युवा कि‍सी दूसरे धर्म में शादी कर ले तो हमें हमारे ही रहनुमा मार देतें है या उनका चाहि‍ता मार देता है । हम पैसे कामाने वाली माशीनो में महि‍लाओं को कम मौका मि‍लता है वो इस लि‍ए की उनके लि‍ए हमारे इस समाज में एक ऐसी व्‍यवस्‍था को बना दि‍या है या यूं कहे थोप दि‍या है जि‍समें उन्‍हें केवल मर्दो की रहगुजारी करना है

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