मैं और चकमक क्लब इमरान खान
मेरा चकमक क्लब से जुड़ना
मेरे साथ मेरा दोस्त अफरोज़ पढ़ता था जो मेरे साथ रोज शाम को खेलता था। मेरे पापा और उसके पापा दोस्त थे इसलिए मैं उसके घर जाया करता था।
एक दिन मैं अपने दोस्त अफरोज के घर गया वहा。 मैं रोज उसे लेने जाता था, क्योंकि हम क्रिकेट खेलने जाते थे। पर उस दिन अफरोज ने कहा- मैं नहीं जाナ。गा। मैंने पूछा क्येां ? उसने कहा अब मैं शाकिर भैया के साथ कुछ सीखता हू。। और उसने मुझे कागज के कुछ खिलौने दिखायें। मैंने उससे पूछा -यार वो क्या पैसे से सिखाते है। तब अफरोज ने कहा, नहीं। मैंने कहा आज मुझे भी अपने साथ लेकर चलेगा। और उस दिन मैं अफरोज के साथ गया। वहा。 सब बच्चे जो मेरे मौहल्ले के थे गोला बनाकर बैठे थे। जब मैं अन्दर गया तो एक भैया ने मुझे बुलाकर मेरा नाम बड़े प्यार से पूछा मैंने अपना नाम बताया। फिर भैया ने अपना नाम बताया मैं शाकिर हू。। और रोज सभी बच्चों को गीत सुनता हू。। फिर भैया ने सुनील ओर ताहिर को बुलाया और कहा सुनील ओरीगाॅमी सिखाता है। और ताहिर कहानी सुनाता हैं। मैंने सोचा यार अपने साथ तो खेलते हैं पर कितने बड़े-बड़े काम करते है। फिर सुनील ने कहा चल गोले में बैठ जा, शाकिर भैया गाना सुनाऐंगे। फिर मैं कागज के खिलौने बनाना सिखाナ。गा। जब मैं गोले में जगह देख रहा था तो ताहिर ने मुझे एक लड़की के पास बैठा दिया मैं डरते-डरते बैठ गया। पहली बार किसी लड़की के पास बैठा था। मन में डर भी लग रहा था कि कहीं हल्ला ना लग जाये। फिर शकिर भैया ने गीत सुनाया ‘‘नानी तेरी मोरनी को मोर ले गये’’ फिर सुनील आया। सभी बच्चे सुनील को सुनील भैया कहकर बुला रहे थे। मैं भी भैया कहने लगा। फिर सुनील ने हमें सितारा बनाना सिखाया और उसके बाद सभी बच्चे समाने रखी बहुत सारी पुस्तकों में से कहानी की पुस्तक निकलवा कर अपने हाथ से एक रजिस्टर में नाम लिख रहे थे। मैंने ताहिर के पास जाकर पूछा- मैं भी ले लूं तो उसने कहा ले ले। मैं पुस्तक लेकर घर चला आया। पापा ने कहा ये पुस्तक कहां से लाया है, मैंने कहा चकमक क्लब से लाया हूं और फिर मैं पढ़ने लगा। अब मैं रोज चकमक क्लब जाने लगा और कभी-कभी नहीं जा पाता तो बहुत बुरा लगने लगा। मेरा भाई भी मेरे साथ जाता पर केवल शनिवार के दिन, क्योंकि उस दिन प्रश्न मंच होता था। और जो जीतता था उसे इनाम मिलता था।
मैं स्त्रोत साथी बना
एक दिन सुनील ने कहा कि आज मैं तुम्हें बहुत सारे खिलौने बनाना सिखाता हू。। क्येांकि तुम आज से स्त्रोत साथी हो और अब तुम सभी को खिलौने बनाना सिखाओगे। मैं उस दिन बहुत खुश था कि अब मुझें सब बच्चे भैया-भैया कहकर बुलायेंगे। वो दिन आज भी याद है। मैं घर गया और पापा को जाकर बोला मैं अब ेत साथी बन गया। पर पापा ने कहा पढ़ाई कौन करेगा। तो मैं उदास हो गया पर मम्मी ने कहा बहुत अच्छा बेटा। मैंने भाई को बताया और दूसरे दोस्तों को भी बताया। बड़ी खुशी का दिन था। दूसरे दिन मैं बहुत सजधज के घर से निकला। चकमक क्लब जाकर के गोले में बैठ गया। तभी सुनील ने कहा आज से इमरान आप सबको खिलौने बनाना सिखाऐगा। तो सब बच्चों ने ताली बजाई। अब मैं खुशी से फूला नहीं समा रहा था। और उसके बाद जब भी मींटिंग होती तो सभी साथी मिलकर तय करते कि कौन से दिन कौन क्या कराएगा। जब कोई नहीं आता तो उसकी जगह कौन सीखाएगा। ऐसा लगता था मानों अब हम सब कुछ कर सकते थे। हम अपना निर्णय स्वंय लेते थे। मन में बहुत अच्छा लगता था। और बहुत खु談ी होती थी। हमें हमारे घर में इस प्रकार की स्वतंत्रता नहीं मिली पर चकमक कल्ब में ये सक कुछ मिला था।
स्वअनु談ासन
हम कभी पिकनिक पर जाते तो पहले सब बच्चों के यहा。 जाकर पेरेन्ट से परमिशन लेना जब पेरेन्टस पूछते की क्या तुम इतने बच्चों को संभाल कर लाओगे तो कभी बच्चें खुद ही कहते कि हम भैया जो कहते करते है। हम रास्ते में मस्ती नहीं करते केवल मैदान में जाकर ही मस्ती करते है। बच्चों का और हमारा खुद का अनुशासन होता है। जो किसी के द्वारा बनाया नहीं गया था। यह स्व अनुशासन होता है। जो बैगर किसी पर लादे ही आ जाता है। हमारे साथ लड़किया भी पिकनिक पर जाती थी। जब की गाॅंव में इसे गन्दा माना जाता कि लड़के-लड़कीयाॅं साथ वो भी इन लोगों के साथ जो अभी खुद ज्यादा समझदार नहीं है। पर हमारे ग्रुप की लड़कियाॅं खुद घर जाकर अपने मम्मी-पापा को मनाती थी। धीरे-धीरे विश्वास बढ़ता गया। क्योंकि अब हमे गा。व के बड़े भी जानने लगे थे कि, ये चकमक वाले है। पिकनिक पर जाना सभी का एक साथ मिलकर मस्ती करना खेलना और फिर खाना खाते समय एक दूसरे के साथ मिलकर खाना। जब काई हिन्दू या मुस्लिमान नहीं होता था। सब लड़ते थे कि पहले मेरा टिफिन खायेंगे फिर तेरा। मेरी मम्मी ने ये भेजा जरा थोड़ा चख तो सही। ऐसा लगता था मानो सब एक ही परिवार के सदस्य है। और शाम को लौटते हुए सब एक दूसरे को घर तक छोड़ने जाते थे। उस समय मेरे मम्मी पापा कहते थे तू इस तरह दूसरे के बच्चों को साथ ले जाता हैं कभी कुछ हो गया तो मैं उन्हें समझता की हम सब स्वअनुशासन बना कर रखते है। तो पापा का जवाब होता था। तू बड़ा हो गया है। पर जब कभी पापा बाजार में अपने दोस्तों से मिलते तो वे बताते कि आज आपका बच्चा हमारे यहां एक पत्रिका देने आया था। जिसका नाम अंकुर था उस पत्रिका में हमारे बच्चों की कविता ओर चित्र होते है। तुम्हारा बच्चा अपने दोस्तों के साथ बहुत अच्छा काम करता है। हमारे बच्चों को खेल खिलाता है। कविता कहानी की किताबे देता हैं तो फिर मेरे पापा घर आकर मम्मी से बात करते कि तुम्हारा बेटे की सब तारिफ करते है। मैं तो उसे बुद्वु समझता था। स्कूल में भी टीचर अब हमारे साथ अलग सा व्यवहार करते है। क्योंकि हम सब स्कूल में जाकर प्राचार्य से बात करते और हमारे बाल मेले में क्या होता है उसके बारे में बताते और फिर स्कूल में बाल मेला करते थे। अब हम जिन साथियों के साथ पढ़ते थे उन्हें हम कुछ सीख रहे होते हैं। मैं विज्ञान प्रयोग करता था। जो शिक्षक हमें किताबों में पढ़ाते थे। मैं उन्हें स्वंय बच्चों को करना सीखता था। जैसे हाइड्र्ोजन गैस बनना आक्सीजन गैस बनाना आदि। इस कारण अब 談िक्षक भी हमसेे बहुत खुश थे। तब हमें लगता था कि अब हम कुछ कर सकते है। गा。व में जहाॅं भी जाते हमें अलग से लोग जानते लगे थे।
सम्पर्क - पउतंदउमू21/हउंपसण्बवउ
फोन - 09685637633
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